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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 5 • श्लोक 2
इह जिनविषयेऽधिमुक्तबुद्धिर्गुणगणभाजनतामुपैति धीमान् । अभिभवति स सर्वसत्त्वपुण्यप्रसवमचिन्त्यगुणाभिलाषयोगात् ॥
जो बुद्धिमान व्यक्ति जिन के इस विषय में श्रद्धा रखता है, वह गुणों का पात्र बन जाता है और अचिन्त्य गुणों की इच्छा से वह सभी प्राणियों के पुण्य को भी अतिक्रम कर जाता है।
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