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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 5 • श्लोक 13
दानं दानमयं पुण्यं शीलं शीलमयं स्मृतम् । द्वे भावनामयं क्षान्तिध्याने वीर्यं तु सर्वगम् ॥
दान से दानमय पुण्य, शील से शीलमय पुण्य और क्षान्ति व ध्यान से भावनामय पुण्य उत्पन्न होता है; वीर्य इन सब में व्यापक है।
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