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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 5 • श्लोक 12
पुण्यं पारमिताः पञ्च त्रेधा तदविकल्पनात् । तत्पूरिः परिशुद्धिस्तु तद्विपक्षप्रहाणतः ॥
पाँच पारमिताएँ पुण्य के रूप में तीन प्रकार से समझी जाती हैं—विकल्प का त्याग, उनकी पूर्णता और उनके विरोधी दोषों का नाश।
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