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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 5 • श्लोक 10
छन्दवीर्यस्मृतिध्यानप्रज्ञादिगुणभाजनम् । बोधिचित्तं भवत्यस्य सततं प्रत्युपस्थितम् ॥
ऐसे व्यक्ति में छन्द, वीर्य, स्मृति, ध्यान और प्रज्ञा जैसे गुण उत्पन्न होते हैं और उसके भीतर बोधिचित्त सदा उपस्थित रहता है।
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