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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 98
बुद्धानां बोधिमागम्य लोकोत्तरपथोदयात् । शुक्लकर्मपयध्यानाप्रमाणारूप्यसंभवः ॥
बुद्धत्व की प्राप्ति से लोकोत्तर मार्ग प्रकट होता है और उससे शुद्ध कर्म, ध्यान तथा आरूप्य अवस्थाओं की सिद्धि होती है।
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