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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 97
पृथिवीमण्डलप्रख्यं तत्प्रतिष्ठाश्रयत्वतः । लौक्यलोकोत्तराशेषजगत्कुशलसंपदम् ॥
वह पृथ्वी के समान है क्योंकि वह सभी लौकिक और अलौकिक शुभ गुणों का आधार है।
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