मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 96
प्रतिश्रुत्कोपमं तद्वन्न च प्रत्ययसम्भवम् । आकाशसदृशं तद्वन्न च शुक्लास्पदं च तत् ॥
वह प्रतिध्वनि के समान है, परन्तु केवल कारण से उत्पन्न होने वाला नहीं; वह आकाश के समान है, परन्तु केवल शुद्ध धर्मों का आधार मात्र नहीं है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें