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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 95
सूर्यमण्डलवत् तद्वन्न नात्यन्ततमोऽपहम् । चिन्तामणिनिभं तद्वन्न च नो दुर्लभोदयम् ॥
वह सूर्य के समान है, परन्तु अंधकार को पूरी तरह उसी प्रकार नहीं हटाता; वह चिन्तामणि के समान है, परन्तु उसका प्रकट होना अत्यन्त दुर्लभ भी नहीं है।
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