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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 94
महामेघोपमं तद्वन्न च नो साथंबीजवत् । महाब्रह्मोपमं तद्वन्न च नात्यन्तपाचकम् ॥
वह महान मेघ के समान है, परन्तु केवल बीज को उगाने वाला नहीं; वह महाब्रह्म के समान भी है, परन्तु सबको समान रूप से परिपक्व करने वाला नहीं।
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