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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 91
अयत्नात्कृत्यमित्येवं दर्शनादि प्रवर्तते । धर्मकायादनुत्पादानिरोधाद्भवस्थितेः ॥
इस प्रकार बुद्ध का कार्य, जैसे दर्शन आदि, बिना प्रयास के प्रकट होता है, क्योंकि धर्मकाय न उत्पन्न होता है और न ही नष्ट होता है।
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