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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 89
शुभं वैडूर्यवच्चित्ते बुद्धदर्शनहेतुकम् । तद्विशुद्धिरसंहार्यश्रद्धेन्द्रियविकासिता ॥
निर्मल वैडूर्य के समान शुद्ध चित्त ही बुद्ध के दर्शन का कारण बनता है और यह शुद्धता अटूट श्रद्धा से विकसित होती है।
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