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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 87
अनास्रवाद्ब्रह्मवदच्युतः पदादनैकधा दर्शनमेति निर्मितैः । सदार्कवज्ज्ञानविनिःसृतद्युतिर्विशुद्धचिन्तामणिरत्नमानसः ॥
वे आस्रवों से रहित होकर ब्रह्मा की भाँति अपने स्थान से विचलित नहीं होते, अनेक रूपों में प्रकट होते हैं और सूर्य की तरह ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।
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