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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 86
सुरेन्द्ररत्नप्रतिभासदर्शनः सुदैशिको दुन्दुभिवद्विभो रुतम् । विभुर्महाज्ञानकृपाभ्रमण्डलः स्फरत्यनन्तं जगदा भवाग्रतः ॥
महान गुरु इन्द्ररत्न के प्रतिबिंब की भाँति प्रकट होते हैं, दुन्दुभि की ध्वनि की तरह उनका उपदेश गूँजता है और ज्ञान तथा करुणा से युक्त होकर वे अनंत जगत को प्रकाशित करते हैं।
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