अयं च प्रकृतोऽत्रार्थो नवधा दर्शनादिकम् । जन्मान्तधिमृते शास्तुरनाभोगात् प्रवर्तते ॥
इस प्रकार यहाँ बताया गया है कि बुद्ध का दर्शन आदि नौ प्रकार के कार्य बिना किसी प्रयास के प्रकट होते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।