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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 84
अयं च प्रकृतोऽत्रार्थो नवधा दर्शनादिकम् । जन्मान्तधिमृते शास्तुरनाभोगात् प्रवर्तते ॥
इस प्रकार यहाँ बताया गया है कि बुद्ध का दर्शन आदि नौ प्रकार के कार्य बिना किसी प्रयास के प्रकट होते हैं।
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