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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 82
सर्वाभोगपरिस्पन्दप्रशान्ता निर्विकल्पिकाः । धियो विमलवैडूर्यशक्रबिम्बोदयादिवत् ॥
बुद्धों की चेतना सभी प्रयासों और चंचलताओं से शांत और निर्विकल्प होती है, जैसे निर्मल वैडूर्य में इन्द्र का प्रतिबिंब प्रकट होता है।
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