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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 77
न प्रयत्नमृतेः कश्चिदृष्टः कुर्वन् क्रियामतः । विनेयसंशयच्छित्त्यै नवोक्तं निदर्शनम् ॥
यह दिखाने के लिए कि बुद्ध का कार्य बिना प्रयास के होता है, शिष्यों के संदेह दूर करने हेतु नौ उदाहरण दिए गए हैं।
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