संबुद्धपृथिवीमेवमविकल्पामशेषतः । जगत्कुशलमूलानि वृद्धिमाश्रित्य यान्ति हि ॥
उसी प्रकार सम्यक् बुद्ध रूपी पृथ्वी पर आश्रित होकर संसार के सभी पुण्य मूल विकसित होते हैं।
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