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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 71
प्रतिश्रुत्कारुतं यद्वत् परविज्ञप्तिसंभवम् । निर्विकल्पमनाभोगं नाध्यात्मं न बहिः स्थितम् ॥
जैसे प्रतिध्वनि किसी अन्य ध्वनि से उत्पन्न होती है और न भीतर स्थित होती है न बाहर, उसी प्रकार बुद्ध का उपदेश भी बिना विकल्प और बिना प्रयास के प्रकट होता है।
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