मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 70
इह शुभमणिप्राप्तिर्यद्वज्जगत्यतिदुर्लभा जलनिधिगतं पातालस्थं यतः स्पृहयन्ति तम् । न सुलभमिति ज्ञेयं तद्वज्जगत्यतिदुर्भगे मनसि विविधक्लेशग्रस्ते तथागतदर्शनम् ॥
जैसे समुद्र की गहराई में स्थित दुर्लभ रत्न को पाना कठिन है, वैसे ही क्लेशों से ग्रस्त मन वाले संसार में तथागत का दर्शन भी अत्यन्त दुर्लभ है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें