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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 69
यथाविकल्पं मणिरत्नमीप्सितं धनं परेभ्यो विसृजत्ययत्नतः । तथा मुनिर्यत्नमृते यथार्हतः परार्थमातिष्ठति नित्यमा भवात् ॥
जैसे मणिरत्न बिना प्रयास के लोगों की इच्छित वस्तु देता है, वैसे ही मुनि भी बिना प्रयास के प्राणियों के हित के लिए कार्य करते हैं।
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