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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 68
बुद्धचिन्तामणिस्तद्वत्समेत्य पृथगाशयाः । शृण्वन्ति धर्मतां चित्रां न कल्पयति तांश्च सः ॥
उसी प्रकार बुद्ध रूपी चिन्तामणि के सामने विभिन्न भाव वाले लोग अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार धर्म को सुनते हैं।
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