मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 65
सर्वक्षेत्रनभस्तलस्फरणता भानोर्न संविद्यते नाप्यज्ञानतमोऽन्धकारगहनज्ञेयार्थसंदर्शनम् । नानावर्णविकीर्णरश्मिविसरैरेकैकरोमोद्भवैर्भासन्ते करुणात्मका जगति तु ज्ञेयार्थसंदर्शकाः ॥
सूर्य स्वयं सब स्थानों को प्रकाशित नहीं करता और न ही अज्ञान के अंधकार को पूर्णतः दूर करता; परन्तु बुद्ध की करुणा से निकली ज्ञान-किरणें जगत में सत्य को प्रकट करती हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें