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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 64
उदित इह समन्ताल्लोकमाभास्य यद्वत् प्रततदशशतांशुः सप्तसप्तिः क्रमेण । प्रतपति वरमध्यन्यूनशैलेषु तद्वत् प्रतपति जिनसूर्यः सत्त्वराशौ क्रमेण ॥
जैसे सूर्य उदित होकर पर्वतों की ऊँचाई के अनुसार प्रकाश देता है, वैसे ही जिन-सूर्य प्राणियों के समूह में उनकी योग्यता के अनुसार प्रकाश फैलाता है।
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