सदा सर्वत्र विसृते धर्मधातुनभस्तले । बुद्धसूये विनेयाद्रितन्निपातो यथार्हतः ॥
धर्मधातु रूपी आकाश में सर्वत्र फैले बुद्ध-सूर्य की किरणें योग्य प्राणियों पर उनके पात्र होने के अनुसार पड़ती हैं।
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