यतः शुचिनि सर्वत्र विनेयसलिलाशये । अमेयसुगतादित्यप्रतिबिम्बोदयः सकृत् ॥
जब प्राणियों का चित्त रूपी जल शुद्ध होता है, तब उसमें असीम सुगत-सूर्य का प्रतिबिंब प्रकट होता है।
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