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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 59
निर्विकल्पो यथादित्यः कमलानि स्वरश्मिभिः । बोधयत्येकमुक्ताभिः पाचयत्यपराण्यपि ॥
जैसे सूर्य बिना विकल्प के अपनी किरणों से कुछ कमलों को खिलाता है और कुछ को पकाता है।
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