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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 54
तद्वन्मुनिरनाभोगान्निर्माणैः सर्वधातुषु । धर्मकायादविचलन् भव्यानामेति दर्शनम् ॥
उसी प्रकार मुनि अपने धर्मकाय से विचलित हुए बिना निर्माणकाय के द्वारा सभी लोकों में प्राणियों को दर्शन देते हैं।
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