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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 53
सर्वत्र देवभवने ब्राह्म्यादविचलन् पदात् । प्रतिभासं यथा ब्रह्मा दर्शयत्यप्रयत्नतः ॥
जैसे ब्रह्मा अपने स्थान से विचलित हुए बिना देवताओं के भवनों में अपना प्रतिबिंब बिना प्रयास के दिखाता है।
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