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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 52
व्याधिज्ञेयो व्याधिहेतुः प्रहेयः स्वास्थ्यं प्राप्यं भेषजं सेव्यमेवम् । दुःखं हेतुस्तन्निरोधोऽथ मार्गो ज्ञेयं हेयः स्पर्शितव्यो निषेव्यः ॥
जैसे रोग को जानना चाहिए, उसके कारण को त्यागना चाहिए, स्वास्थ्य को प्राप्त करना चाहिए और औषधि का सेवन करना चाहिए; वैसे ही दुःख को जानना, उसके कारण को त्यागना, निरोध को प्राप्त करना और मार्ग का आचरण करना चाहिए।
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