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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 49
स्थूलैर्बिन्दुनिपातनैरशनिभिर्वज्राग्निसंपातनैः सूक्ष्मप्राणकशैलदेशगमिका नापेक्षते तोयदः । सूक्ष्मौदारिकयुक्त्युपायविधिभिः प्रज्ञाकृपाम्भोधरस्तद्रूत्क्लेशगतान्दृष्ट्यनुशयान्नापेक्षते सर्वथा ॥
जैसे मेघ वर्षा करते समय स्थान विशेष का विचार नहीं करते, वैसे ही प्रज्ञा और करुणा से युक्त बुद्ध सभी प्राणियों के क्लेशों को दूर करने के लिए धर्म का उपदेश देते हैं।
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