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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 48
ग्रीष्मान्तेऽम्बुधरेष्वसत्सु मनुजा व्योम्न्यप्रचाराः खगा वर्षास्वप्यतिवर्षणप्रपतना त्प्रेताः क्षितौ दुःखिताः । अत्रादुर्भवनोदयेऽपि करुणामेघाभ्रवर्माम्भसो धर्माकाङ्क्षिणि धर्मताप्रतिहते लोके च सैवोपमा ॥
जैसे कुछ लोग वर्षा की प्रतीक्षा करते हैं, कुछ उससे बचते हैं और कुछ उससे पीड़ित होते हैं; वैसे ही संसार में धर्म वर्षा को भी प्राणी अपने-अपने स्वभाव के अनुसार ग्रहण करते हैं।
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