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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 46
शीतं स्वादु प्रसन्नं मृदु लघु च पयस्तत्पयोदाद्विमुक्तं क्षारादिस्थानयोगादतिबहुरसतामेति यद्वत्पृथिव्याम् । आर्याष्टाङ्गाम्बुवर्ष सुविपुलकरुणामेघगर्भाद्विमुक्तं सन्तानस्थानभेदाद्बहुविधरसतामेति तद्वत्प्रजासु ॥
जैसे मेघ से गिरा जल पृथ्वी के भिन्न स्थानों में जाकर विभिन्न स्वाद और गुण धारण कर लेता है, वैसे ही करुणा के मेघ से बरसा आर्य अष्टाङ्ग मार्ग का धर्म विभिन्न प्राणियों में उनके स्वभाव के अनुसार भिन्न फल देता है।
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