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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 45
भवेषु संवित्करुणावभृत्कः क्षराक्षरासङ्गनभस्तलस्थः । समाधिघारण्यमलाम्बुगर्भो मुनीन्द्रमेघः शुभसस्यहेतुः ॥
मुनि रूपी मेघ करुणा और ज्ञान से परिपूर्ण होकर संसार में शुभ कर्मों की वृद्धि के लिए धर्म वर्षा करते हैं।
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