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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 44
लोके यथा कुशलकर्मपथप्रवृत्ते वर्षन्ति वायुजनितं सलिलं पयोदाः । तत्कृपानिलजगत्कुशलाभिवृद्धेः सद्धर्मवर्षमभिवर्षति बुद्धमेघः ॥
जैसे वायु से प्रेरित मेघ पृथ्वी पर वर्षा करते हैं, वैसे ही करुणा की वायु से प्रेरित बुद्ध रूपी मेघ संसार के कल्याण के लिए धर्म की वर्षा करते हैं।
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