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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 43
करुणाम्बुदतस्तद्वत्सद्धर्मसलिलं जिनः । जगत्कुशलसस्येषु निर्विकल्पं प्रवर्षति ॥
उसी प्रकार करुणा रूपी मेघ से जिन बिना किसी विकल्प के संसार के कल्याण रूपी खेतों पर सद्धर्म का जल बरसाते हैं।
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