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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 42
प्रावृट्काले यथा मेघः पृथिव्यामभिवर्षति । वारिस्कन्धं निराभोगो निमित्तं सस्यसंपदः ॥
जैसे वर्षा ऋतु में मेघ बिना प्रयास के पृथ्वी पर जल बरसाते हैं और उससे अन्न की समृद्धि होती है।
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