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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 41
यथा सूक्ष्मान् शब्दाननुभवति न श्रोत्रविकलो न दिव्यश्रोत्रेऽपि श्रवणपथमायान्ति निखिलम् । तथा धर्मः सूक्ष्मः परमनिपुणज्ञानविषयः प्रयात्येकेषां तु श्रवणपथमविलष्टमनसाम् ॥
जैसे सूक्ष्म ध्वनियाँ सभी के कानों तक नहीं पहुँचतीं, वैसे ही यह सूक्ष्म धर्म केवल उन लोगों के श्रवण में आता है जिनका मन शुद्ध और सजग होता है।
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