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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 39
शुभा मनोज्ञा दिवि तूर्यनिस्वना भवन्ति चित्तोद्धतिवृद्धिहेतवः । तथागतानां तु रुतं महात्मनां समाधिचित्तार्पणभाववाचकम् ॥
स्वर्ग के मधुर वाद्य चित्त की उच्छृंखलता बढ़ाते हैं, परन्तु तथागतों की वाणी समाधि और मन की स्थिरता का उपदेश देती है।
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