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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 38
बद्ध्योऽमराणां दिवि तूर्यकोट्यो नदन्ति कामज्वलनाभिवृद्धौ । एकस्तु घोषः करुणात्मकानां दुःखाग्निहेतुप्रशमप्रवृत्तः ॥
स्वर्ग में असंख्य वाद्य बजते हैं जो कामना की अग्नि को बढ़ाते हैं, परन्तु करुणामय बुद्ध का एक ही स्वर दुःखरूपी अग्नि को शांत करने के लिए होता है।
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