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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 34
देवानां दिवि दिव्यदुन्दुभिरवो यद्वत् स्वकर्मोद्भवो धर्मोदाहरणं मुनेरपि तथा लोके स्वकर्मोद्भवम् । यत्नस्थानशरीरचित्तरहितः शब्दः स शान्त्यावहो यद्वत् तद्वदृते चतुष्टयमयं धर्मः स शान्त्यावहः ॥
जैसे देवताओं का दिव्य दुन्दुभि-नाद उनके कर्मों से उत्पन्न होकर शान्ति देता है, वैसे ही मुनि का धर्मोपदेश भी बिना शरीर, चित्त या प्रयास के कर्म के प्रभाव से प्रकट होकर चार आर्य सत्यों का उपदेश देता है और शान्ति प्रदान करता है।
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