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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 32
अनित्यदुःखनैरात्म्यशान्तशब्दैः प्रमादिनः । चोदयत्य् अमरान् सर्वानसकृद्देवदुन्दुभिः ॥
वह दिव्य दुन्दुभि अनित्य, दुःख, अनात्म और शान्ति के उपदेश से देवताओं को बार-बार सचेत करती है।
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