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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 3
यस्य येन च यावच्च यदा च विनयक्रिया । तद्विकल्पोदयाभावादनाभोगः सदा मुनेः ॥
किस प्राणी को किस उपाय से, कितनी मात्रा में और किस समय शिक्षित करना है—इसमें मुनि के मन में कोई विकल्प उत्पन्न नहीं होता; इसलिए उनका कार्य सहज और बिना प्रयास के होता है।
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