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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 29
यथैव वैडूर्यमहीतले शुचौ सुरेन्द्रकायप्रतिबिम्बसंभवः । तथा जगच्चित्तमहीतले शुचौ मुनीन्द्रकायप्रतिबिम्बसंभवः ॥
जैसे स्वच्छ वैडूर्य भूमि पर इन्द्र का प्रतिबिंब दिखाई देता है, वैसे ही निर्मल चित्तभूमि में बुद्ध का प्रतिबिंब प्रकट होता है।
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