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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 27
भूर्यद्वत्स्यात्समन्तव्यपगतविषमस्थानान्तरमला वैडूर्यस्पष्टशुभ्रा विमलमणिगुणा श्रीमत्समतला । शुद्धत्वात्तत्र बिम्बं सुरपतिभवनं माहेन्द्रमरुतामुत्पद्येत क्रमेण क्षितिगुणविगमादस्तं पुनरियात् ॥
यदि पृथ्वी सर्वत्र सम और निर्मल वैडूर्य मणि के समान हो तो उसमें इन्द्र के भवन और देवताओं के रूप प्रतिबिंबित होते हैं; और जब पृथ्वी की वह शुद्धता समाप्त होती है तो वह प्रतिबिंब भी लुप्त हो जाता है।
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