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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 26
तद्धि दर्शनमागम्य क्रमादस्मिन्नये स्थिताः । सद्धर्मकार्य मध्यस्थं पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषा ॥
उस दर्शन के आधार पर धीरे-धीरे वे इस मार्ग में स्थिर होते हैं और ज्ञानचक्षु से सद्धर्म के कार्य को देखते हैं।
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