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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 25
स्वचित्तप्रतिभासोऽयमिति नैवं पृथग्जनाः । जानन्त्यथ च तत्तेषामवन्ध्यं बिम्बदर्शनम् ॥
सामान्य लोग यह नहीं जानते कि यह उनके अपने चित्त का प्रतिबिंब है, फिर भी बुद्ध का यह दर्शन उनके लिए निष्फल नहीं होता।
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