तं च दृष्ट्वाभियुज्यन्ते बुद्धत्वाय स्पृहान्विताः । तद्धेतुं च समादाय प्राप्नुवन्तीप्सितं पदम् ॥
उन्हें देखकर लोग बुद्धत्व की इच्छा करते हैं और उसके कारणों का आचरण कर अंततः इच्छित परम पद को प्राप्त करते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।