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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 21
लक्षणव्यञ्जनोपेतं विचित्रैर्यापथक्रियम् । चङ्क्रम्यमाणं तिष्ठन्तं निषण्णं शयनस्थितम् ॥
प्राणी अपने मन में बुद्ध को विभिन्न लक्षणों और व्यञ्जनों से युक्त देखते हैं—चलते हुए, खड़े हुए, बैठे हुए या शयन अवस्था में।
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