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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 20
तथा श्रद्धादिविमले श्रद्धादिगुणभाविते । सत्त्वाः पश्यन्ति संबुद्धं प्रतिभासं स्वचेतसि ॥
उसी प्रकार श्रद्धा आदि गुणों से शुद्ध हुए मन वाले प्राणी अपने ही चित्त में बुद्ध का प्रतिबिंब देखते हैं।
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