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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 19
प्रतिभासः स चात्यन्तमविकल्पो निरीहकः । एवं च महतार्थेन भुवि स्यात्प्रत्युपस्थितः ॥
वह प्रतिबिंब स्वयं बिना किसी प्रयास के प्रकट होता है और महान फल देने वाला होता है।
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